नया राष्ट्रीय खेल : सोशल मीडिया मित्रता महाकुंभ
( व्यंग्य)
प्रदीप सक्सेनाकभी इस देश में क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, कुश्ती, शतरंज और एथलेटिक्स जैसे खेलों में रिकॉर्ड बनते थे। खिलाड़ी वर्षों तक पसीना बहाते थे, तब कहीं जाकर कोई पदक, ट्रॉफी या सम्मान उनके हिस्से आता था। कोई ओलंपिक जीतकर लौटता था, कोई विश्व रिकॉर्ड बनाता था और कोई अपने खेल से देश का नाम दुनिया में रोशन करता था। लेकिन समय बदल गया है।
अब एक नया खेल जन्म ले चुका है—सोशल मीडिया महाकुंभ।
इस खेल में न मैदान चाहिए, न कोच, न अभ्यास और न ही शारीरिक क्षमता। केवल एक मोबाइल, इंटरनेट का रिचार्ज और प्रसिद्ध होने की अधीर इच्छा होनी चाहिए। फिर देखिए कैसे रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनते चले जाते हैं।
पहली प्रतियोगिता है—"एक दिन में सबसे अधिक अनजान लोगों से दोस्ती करो।"
खिलाड़ी का असली नाम क्या है, वह कहाँ रहता है, क्या करता है—इन सबका कोई महत्व नहीं। बस प्रोफाइल फोटो आकर्षक होनी चाहिए और संदेश तैयार रहना चाहिए—"हाय... फ्रेंड बनोगे?"
दूसरी प्रतियोगिता है—"रील देखकर प्रेम में पड़ो चैंपियनशिप।"
तीस सेकंड की रील देखी, दो दिल वाले इमोजी भेजे, चार मीठे संवाद हुए और अगले ही दिन घोषणा—"तुम्हारे बिना जी नहीं सकता।"
कुछ दिनों बाद वही खिलाड़ी दूसरी प्रतियोगिता में भाग लेता है—"दिल टूट गया, दुनिया बेवफा है।"
तीसरा खेल है—"सबसे अधिक झूठ बोलो लीग।"
इसमें अपनी उम्र बदलो, फोटो बदलो, नौकरी बदलो, बैंक बैलेंस बदलो और यदि जरूरत पड़े तो अपना पूरा व्यक्तित्व ही बदल डालो। सच बोलने वाले खिलाड़ी को इस प्रतियोगिता के योग्य नहीं माना जाता।
चौथी प्रतियोगिता है—"वायरल होने के लिए कुछ भी करो स्पर्धा।"
कोई सड़क पर नाच रहा है, कोई अस्पताल में अभिनय कर रहा है, कोई सार्वजनिक स्थानों पर अजीब हरकतें करके तालियाँ बटोरने की कोशिश कर रहा है। उद्देश्य केवल एक—कैसे भी करके स्क्रीन पर छा जाना।
अब सरकार को भी इस नई प्रतिभा का सम्मान करना चाहिए। जब हर क्षेत्र में पुरस्कार दिए जाते हैं तो यहाँ क्यों नहीं?
सबसे अधिक फॉलोअर्स बनाने पर स्वर्ण पदक।
सबसे अधिक अनजान लोगों को "जान", "डियर" और "सोलमेट" कहने पर रजत पदक।
एक साथ सबसे अधिक ऑनलाइन मित्र बनाने पर ट्रॉफी।
बिना तथ्य के सबसे अधिक बातें फैलाने पर विशेष सम्मान।
और बिना किसी वास्तविक उपलब्धि के केवल रीलों के सहारे प्रसिद्ध होने पर आजीवन गौरव पुरस्कार।
दर्शकों की भी भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है। पहले खेल के मैदानों में बैठकर लोग खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाते थे, अब मोबाइल की स्क्रीन पर अंगूठा चलाकर किसी को भी रातों-रात महान बना देते हैं।
कभी माता-पिता पूछते थे—"बेटा, बड़े होकर क्या बनोगे?"
आज का उत्तर है—"बस वायरल हो जाऊँ, फिर जीवन सफल है।"
संभव है कि आने वाले समय में इतिहास की किताबों में नया अध्याय जोड़ा जाए—
"डिजिटल युग के महान रिकॉर्डधारी"
पहला—जिसके करोड़ों फॉलोअर्स थे।
दूसरा—जिसने हजारों अनजान लोगों से दोस्ती की।
तीसरा—जिसने एक दिन में सबसे अधिक रीलें बनाईं।
और चौथा—जो वास्तविक जीवन में किसी को नहीं जानता था, लेकिन सोशल मीडिया पर पूरी दुनिया उसका "परिवार" थी।
कभी लोग अपने कर्मों से पहचाने जाते थे, अब कई लोग अपने कैमरे के सामने किए गए अभिनय से पहचान बनाने में लगे हैं। शायद यही आधुनिक युग का सबसे बड़ा व्यंग्य है कि जहाँ वास्तविक उपलब्धियों के लिए वर्षों की मेहनत चाहिए, वहीं दिखावे के लिए केवल कुछ सेकंड की रील काफी है।
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