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सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ी टिप्पणी की

 


नई दिल्ली

लिव-इन रिलेशनशिप और उसमें सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर कोई कपल बिना शादी किए अपनी मर्जी से लंबे समय तक साथ रहता है और बाद में किसी वजह से उनके रास्ते अलग हो जाते हैं, तो इसे रेप का मामला नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने शादी का झांसा देकर रेप करने का आरोप लगाने वाली एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त बात कही। इस मामले में महिला और आरोपी लंबे समय से लिव-इन में रह रहे थे और उनका एक बच्चा भी है।

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने याचिकाकर्ता महिला से तीखा सवाल किया कि आखिर उसने शादी से पहले आरोपी के साथ रहने का फैसला क्यों किया था। जज ने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट द्वारा ऐसे सवाल पूछने पर अक्सर ‘विक्टिम शेमिंग’ (पीड़िता को ही दोषी ठहराने) का आरोप लगा दिया जाता है, लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों की सच्चाई और परिस्थितियों की गहराई को समझने के लिए ऐसे सवाल पूछना बेहद जरूरी हो जाता है। 

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि महिला 18 साल की उम्र में विधवा हो गई थी और जब वह आरोपी के संपर्क में आई, तो उसने शादी का वादा करके उसे अपने साथ रखा। महिला को बहुत बाद में पता चला कि वह व्यक्ति पहले से ही शादीशुदा है। इस पर अदालत ने पूछा कि यह बात छिपाए जाने के बावजूद महिला ने उसके साथ रहकर बच्चा पैदा करने का विकल्प क्यों चुना।

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