भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ा, 2015 के 19% से बढ़कर 2026 में 68.4% हुआ कवरेज
नई दिल्ली।
भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायरा पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के व्यापक विस्तार, डिजिटल सुधारों और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से अब देश की 68.4% आबादी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ गई है। वर्ष 2015 में यह आंकड़ा महज 19% था। इस विस्तार के साथ एक अरब से अधिक लोगों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है। सरकार का जोर संगठित और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, गिग वर्कर्स, पेंशनभोगियों और कमजोर वर्गों तक भविष्य निधि, पेंशन, बीमा तथा अन्य कल्याणकारी सुविधाएं पहुंचाने पर है।
श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है सामाजिक सुरक्षा
बदलती अर्थव्यवस्था के साथ रोजगार के स्वरूप और आजीविका के साधनों में भी बदलाव आया है। अनौपचारिक रोजगार, गिग और प्लेटफॉर्म आधारित काम के विस्तार के कारण श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का महत्व बढ़ा है। सामाजिक सुरक्षा न केवल आय के नुकसान और आकस्मिक परिस्थितियों में आर्थिक सहायता देती है, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारत में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) इस व्यवस्था का प्रमुख स्तंभ है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला यह वैधानिक निकाय पात्र कर्मचारियों को भविष्य निधि, पेंशन और बीमा संबंधी लाभ उपलब्ध कराता है। इसकी योजनाओं से श्रमिक सेवानिवृत्ति के लिए बचत कर सकते हैं और अपने परिवार को वित्तीय सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
ईपीएफओ की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के तीन प्रमुख स्तंभ
ईपीएफओ की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से तीन योजनाओं पर आधारित है। इनमें कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ), कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) और कर्मचारी जमा लिंक्ड बीमा योजना (ईडीएलआई) शामिल हैं। कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ): इस योजना के तहत कर्मचारी और नियोक्ता के योगदान तथा उस पर मिलने वाले ब्याज के माध्यम से सेवानिवृत्ति के लिए बचत तैयार होती है। निर्धारित शर्तों के अनुसार आवास, उच्च शिक्षा, विवाह और चिकित्सा उपचार जैसी आवश्यकताओं के लिए आंशिक निकासी की सुविधा भी उपलब्ध है।
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