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अहसासों की प्रेम कहानी


प्रदीप सक्सेना

लाली के होठों की लाली के, जो निशान हमारे सीने पर थे, हमने उन्हें कभी मिटाया नहीं, अगली मुलाकात के इंतज़ार में पाँच-दस दिन तक नहाया नहीं।
डर था कहीं पानी की बूँदें उन यादों को धो न जाएँ, उसके होठों की लाली के चिन्ह मेरे सीने से खो न जाएँ। लाली भी मेरी बाँहों के वे निशान कहाँ मिटा पाती थी, अपनी प्यारी-सी मुस्कान में हर राज़ छुपा ले जाती थी।

कलाई की मौली, चूड़ियों की खनक, सब सच कह देतीं अगर, इसलिए बहानों की चादर ओढ़े, वह रहती थी अक्सर। 
बार-बार अपनी चुनरी को हाथों पर यूँ लपेटती थी, मेरे प्रेम के चिह्नों को दुनिया से छुपा लेती थी।
यूँ ही ऐहसासों का कारवाँ, जीवन भर चलता आया है, हमारी प्रेम कहानी को एक अरसा बीत गया है।

अब बालों में सफेदी उतर आई, उम्र ने अपना रंग दिखाया है, फिर भी लगता है जैसे यह किस्सा कल ही का साया है।
आज भी उसके आलिंगन की वह कोमल ऊष्मा याद आती है, उसके सीने की धड़कनों का दबाव मेरे सीने में गूँज जाता है।
वह केवल एक आलिंगन न था, न क्षण भर का कोई अरमान था, वह तो जीवन भर साथ निभाने का मौन, अटल विश्वास था।
समय बदल गया, मौसम बदले, पर प्रेम नहीं बदल पाया है, हमारे ऐहसासों की यह कहानी आज भी दिल में  ताजा है।

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