पश्चिम बंगाल में ममता का आखिरी किला ढहा, फलता में भाजपा की एक लाख वोटों से ऐतिहासिक जीत
कोलकाता।
पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बड़ी जीत दर्ज करते हुए तृणमूल कांग्रेस के मजबूत गढ़ को ध्वस्त कर दिया। भाजपा प्रत्याशी देबाशीष पांडा ने एक लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की। इस परिणाम को राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। उपचुनाव के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी जहांगीर खान को लेकर रही। मतदान से दो दिन पहले उन्होंने चुनाव मैदान छोड़ने का ऐलान कर दिया था। इसके बाद भाजपा की जीत लगभग तय मानी जा रही थी।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रचार के अंतिम दिन भाजपा प्रत्याशी को एक लाख वोटों से जिताने का लक्ष्य रखा था। मतगणना के 18 राउंड तक भाजपा उम्मीदवार करीब 92 हजार वोटों से आगे चल रहे थे, जबकि अंतिम जीत का अंतर एक लाख आठ हजार से अधिक पहुंच गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पिछले लोकसभा चुनाव में इसी क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस को करीब 1.70 लाख वोटों की बढ़त मिली थी, लेकिन इस उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार को महज साढ़े पांच हजार के आसपास वोट मिले। मतदान के दौरान कई बूथों पर तृणमूल कांग्रेस का काेई एजेंट मौजूद नहीं था। वहीं, मतगणना केंद्र में भी पार्टी की सक्रियता बेहद कमजोर दिखाई दी। इस उपचुनाव में वाममोर्चा समर्थित उम्मीदवार शंभूनाथ कुर्मी ने लगभग 37 हजार वोट हासिल कर ध्यान खींचा। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी अब्दुर रज्जाक मोल्ला को करीब साढ़े नौ हजार वोट मिले। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के कमजोर पड़ने से राज्य की विपक्षी राजनीति में नई संभावनाएं बन सकती हैं।
फलता उपचुनाव की पृष्ठभूमि काफी विवादित रही। विधानसभा चुनाव के दौरान कई बूथों के ईवीएम में इत्र, स्याही और टेप लगाए जाने जैसी अनियमितताओं के आरोप लगे थे। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने चुनाव रद्द कर पुनर्मतदान कराने का फैसला लिया था।
इसी दौरान जहांगीर खान और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अजयपाल शर्मा के बीच तनाव की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुर्खियों में रहीं।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रचार के अंतिम दिन भाजपा प्रत्याशी को एक लाख वोटों से जिताने का लक्ष्य रखा था। मतगणना के 18 राउंड तक भाजपा उम्मीदवार करीब 92 हजार वोटों से आगे चल रहे थे, जबकि अंतिम जीत का अंतर एक लाख आठ हजार से अधिक पहुंच गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पिछले लोकसभा चुनाव में इसी क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस को करीब 1.70 लाख वोटों की बढ़त मिली थी, लेकिन इस उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार को महज साढ़े पांच हजार के आसपास वोट मिले। मतदान के दौरान कई बूथों पर तृणमूल कांग्रेस का काेई एजेंट मौजूद नहीं था। वहीं, मतगणना केंद्र में भी पार्टी की सक्रियता बेहद कमजोर दिखाई दी। इस उपचुनाव में वाममोर्चा समर्थित उम्मीदवार शंभूनाथ कुर्मी ने लगभग 37 हजार वोट हासिल कर ध्यान खींचा। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी अब्दुर रज्जाक मोल्ला को करीब साढ़े नौ हजार वोट मिले। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के कमजोर पड़ने से राज्य की विपक्षी राजनीति में नई संभावनाएं बन सकती हैं।
फलता उपचुनाव की पृष्ठभूमि काफी विवादित रही। विधानसभा चुनाव के दौरान कई बूथों के ईवीएम में इत्र, स्याही और टेप लगाए जाने जैसी अनियमितताओं के आरोप लगे थे। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने चुनाव रद्द कर पुनर्मतदान कराने का फैसला लिया था।
इसी दौरान जहांगीर खान और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अजयपाल शर्मा के बीच तनाव की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुर्खियों में रहीं।
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