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धर्म को पूजा-पद्धति की सीमाओं से बाहर निकाल कर आचरण में उतारेंः मोहन भागवत

 


उज्जैन। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं से धर्म को पूजा-पद्धति की सीमाओं से बाहर निकाल कर जीवन और आचरण से जोड़ने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि धर्म को अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ शब्द का समानार्थी मानना सही नहीं है। ‘रिलीजन’ का संबंध बांधने और अनुशासन में रखने से है, जबकि धर्म व्यक्ति को मुक्त करता है।डॉ. भागवत ने सेवाज्ञ संस्थानम के तत्वावधान में यहां गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद में शुक्रवार को कहा कि भारत में धर्म जीवन के हर चरण में मौजूद रहता है। इसे मानें या न मानें, अस्तित्व के आरंभ से अंत तक धर्म बना रहता है और जीवन के अनेक नियम उसी के अनुरूप चलते हैं।गीता भवन में 17 से 19 सितंबर तक आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ में देशभर से करीब 1,700 छात्र-छात्राएं भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम में शुक्रवार को करीब 300 विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्यों ने भी हिस्सा लिया। डॉ. भागवत उद्घाटन सत्र में शामिल हुए, जबकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इसके समापन सत्र में 19 सितंबर को शामिल होंगे।

संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि मनुष्य जब अपने अहंकार में यह मान बैठता है कि दुनिया उसकी इच्छा और नियंत्रण के अनुसार चलेगी, वहीं से उसकी सबसे बड़ी गलतफहमी शुरू होती है। प्रकृति किसी व्यक्ति की सत्ता नहीं मानती और उसके नियम मनुष्य की इच्छा से नहीं बदलते। सूर्य का उदय और अस्त इसका सहज उदाहरण है।उन्होंने कहा कि पश्चिमी समाज ने भारत में धर्म के आचरण, कर्मकांड और अनुशासन को देखा और उसे अपने यहां प्रचलित ‘रिलीजन’ के समान समझ लिया। बाद में भारत में भी धर्म के लिए इसी शब्द का इस्तेमाल होने लगा। भागवत ने कहा कि धर्म के कर्मकांड उसके अभ्यास का हिस्सा हैं, लेकिन कर्मकांड ही पूरा धर्म नहीं है।

डॉ. भागवत ने इस दौरान मानव अहंकार को धर्म की समझ में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बताया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जब यह मानने लगता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है और हर चीज उसकी इच्छा के मुताबिक होनी चाहिए, तब वह वास्तविकता से दूर होने लगता है। उन्होंने उस धारणा को भी खारिज किया कि भगवद्गीता और रामायण सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ने वाले ग्रंथ हैं।उन्होंने कहा कि धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से लेकर अंत तक बना रहता है, इसलिए युवावस्था में धर्म को समझना और उसे जीवन में उतारना उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने युवाओं से ऐसा जीवन जीने की अपील की, जिससे पूरा विश्व उनसे प्रेरणा ले। उनके अनुसार धर्म को किसी एक आयु, पूजा या धार्मिक गतिविधि तक सीमित नहीं किया जा सकता। 

डॉ. भागवत ने धर्म की व्यावहारिक व्याख्या करते हुए कहा कि हम भोजन करते हैं, लेकिन उसके बाद कचरा नहीं करते, यह भी धर्म है। सड़क पर यातायात नियमों का पालन करना भी धर्म है। यानी धर्म व्यक्ति के रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। अपनी उपासना-पद्धति, जो प्रकृति, गुरु या परंपरा से मिली है, उसका सम्मान होना चाहिए और दूसरों की उपासना-पद्धति का भी उतना ही सम्मान किया जाना चाहिए। किसी को अपने मत में परिवर्तित करने की कोशिश न करना भी धर्म के आचरण का हिस्सा है।

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