प्रदीप सक्सैनाइंसान अच्छा है या बुरा, यह एक देखने का नजरिया है। हर इंसान में कमी होती है तो अच्छाई भी। कुछ बुराई मजबूरी की होती है, वह आदत में आ जाती है तो उन्माद पैदा कर इंसान के मूल स्वभाव को परिवर्तित करती है। पिछले कई वर्षों से हम सभी देख रहे हैं कि व्यक्ति अपने आप को साबित करने के लिए किसी भी हद तक जा रहा है, जिसके कारण सामाजिक रचना का स्वरूप बदल रहा है। समाज का विघटन हो रहा है। लोग अहंकारी होते जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता में एक-दूसरे को चैलेंज देना एक आम भाषा हो गई है। कोई भी स्त्री-पुरुष बड़ा पैदा नहीं होता, उसका जन्म शिशु के रूप में ही होता है। किसी भी बच्चे को जन्म से पहले अपने माता-पिता चुनने का अधिकार नहीं होता। माता चुन सकती है कि बच्चे को जन्म देना है या नहीं। शिशु को नहीं पता होता कि उसका जन्म जिस घर में हुआ है वह गरीब का है या धनवान का, ब्राह्मण का है, बनिये का है, शूद्र का है या क्षत्रिय का, हिन्दू का है या सिख का, ईसाई का या मुस्लिम का। वह तो मानव के रूप में धरती पर आया। उसे पति-पत्नी रूपी पुरुष एवं स्त्री ने अपने दाम्पत्य जीवन के शारीरिक रिश्तों से जन्म दिया।
शिशु के जन्म की प्रक्रिया किसी वर्ण, जाति, सम्प्रदाय से नहीं होती, वह तो दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों के शारीरिक रिश्तों से होती है। शारीरिक रिश्तों में जो देहसुख मिलता है उस सुख का कोई वर्ण नहीं, कोई सम्प्रदाय नहीं, कोई जाति नहीं, कोई अमीरी-गरीबी नहीं, बस सुख सुख है। इसी तरह दुख की भी यही स्थिति है। विचारणीय है, जब हम सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करते हैं तो यह भी देखते हैं कि सर्दी-जुकाम से लेकर कैंसर, हार्ट अटैक, हार्ट फेल जैसी अनेक बीमारियाँ जाति, वर्ण, धर्म, सम्प्रदाय को देखकर नहीं आतीं, वह तो इंसान के शरीर में प्रवेश करती हैं। सभी बीमारियों का इलाज भी मानव शरीर देखकर किया जाता है, जाति-वर्ण-सम्प्रदाय देखकर अलग-अलग दवाओं का निर्माण तो नहीं होता। सबसे पहले यह सोचना आवश्यक है कि हमारा जन्म जिस स्थान पर हुआ, जहाँ हम रह रहे हैं, वहाँ के व्यक्ति का स्वास्थ्य, स्वभाव, मानसिक-शारीरिक विकास वहाँ की भौगोलिक स्थिति, नदी-तालाब, मौसम, खानपान के अनुसार ही होता है।
उदाहरण: इंसान के जीवन के लिए प्राकृतिक तौर पर जीने के लिए सबसे पहले ऑक्सीजन और पानी, सूर्य प्रकाश आवश्यक है। प्रकृति ने हिन्दू वर्ण ब्राह्मण, सुनार, वैश्य, शूद्र, क्षत्रिय, साथ ही सम्प्रदाय ईसाई, सिख, मुस्लिम के लिए अलग-अलग ऑक्सीजन, पानी, सूर्य प्रकाश नहीं बनाया। जो है सबके लिए एक ही है। खेत ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र के नाम, ईसाई, मुस्लिम, सिख के नाम से हो सकते हैं, वह जमीन का टुकड़ा है, पर उस पर जो कृषि के लिए मिट्टी है वह तो सभी की एक समान है। साल में चार फसल आती हैं। इसके अलावा सब्जी, भाजी, फल आदि पर यह नहीं लिखा होता कि वह किसके लिए है। अलग-अलग लोगों के खेत से निकलकर मंडी में जाकर मिक्स हो जाती है। व्यापारी को व्यापार करना है, वह व्यक्ति विशेष देखकर सामान नहीं बेचता, वह व्यक्ति नहीं, ग्राहक-खरीदार देखता है। जो उचित मूल्य दे रहा है, उसे प्राथमिकता देता है और क्वालिटी के आधार पर वह अपने ग्राहक को बाँध लेना चाहता है। वह स्थायी ग्राहक चाहता है, जिसमें उसे कम मेहनत करनी पड़े, लाभ ज्यादा हो।
*निष्कर्ष:* पहले मानवीयता जरूरी है, साथ ही यह भी जरूरी है कि हम जिस घर, जिस स्थान और जिस परिवार में जन्मे हैं, वहाँ की संस्कृति का भी सम्मान करें, उसे आगे लेकर जाएँ। संस्कृति और संस्कारों को लेकर प्रतिस्पर्धा, कटुता न पालें। अपनी सामाजिक व्यवस्था, मोहल्ले, शहर, प्रदेश, देश में विरोधाभास से बचें। जो हमारे परिचित हैं, निकटजन हैं, वह हमारे हैं। अनजान, अपरिचित हमारे अपने कैसे हो सकते हैं। इतिहास गवाह है कि विकास की जगह विस्तारवादी नीति पर जो चला, उसने आखिर में विनाश के अलावा कुछ नहीं देखा। सिकंदर से लेकर अशोक को देख लीजिए। पूरा विश्व जीतकर भी खाली हाथ रहे। सिकंदर ने विश्व को जीत लेने के बाद दुखी मन से लिखा था: मेरे जनाजे में मेरे हाथ और पैर खुले रखे जाएँ, जिससे लोग देख सकें कि खाली हाथ आया था, सब कुछ जीतकर खाली हाथ ही जाना है। सम्राट अशोक कलिंग युद्ध जीतकर वहाँ युद्ध में मृत, घायल सैनिकों को देख विचलित हुए और पूरा साम्राज्य छोड़ शांति की तलाश में निकल गए, बुद्ध की शरण में। ऐसे अनेक उदाहरण हैं इतिहास में।
वर्तमान में भी विश्व में इस्राइल-ईरान साथ अमेरिका (ट्रम्प) के बीच खाड़ी देशों में युद्ध चल रहा है, वह भी विकास की जगह क्षेत्र विस्तार का युद्ध है। स्वाभाविक है, किसी के घर पर कब्जा होगा तो वह विरोध तो करेगा ही। पर युद्ध का असर तो प्रकृति से लेकर हर इंसान, जल-जीव आदि पर पड़ रहा है। समुद्री लड़ाई में कितने जल-जीव मृत हो रहे हैं, यह अनुमान लगाना असंभव ही है। रूस-यूक्रेन युद्ध 2022 में शुरू हुआ, चार साल से चल रहा है। बीच-बीच में युद्ध विराम होता रहता है। वर्तमान खाड़ी युद्ध की भी यही चाल रहने की संभावना है। इस्राइल-ईरान-इराक विवाद आज का नहीं, अनेक वर्षों से चला आ रहा है। किसी भी युद्ध का अंत आखिर शांति वार्ता से ही होता है, न कि आग, गोला-बारूद से। आग-गोले-बारूद कब तक चलेंगे? मानव निर्मित कोई चीज स्थायी नहीं होती।
हमारे देश की बात करें तो सामाजिक मूल्यों व व्यक्तिगत व्यवहार में काफी गिरावट है। साथ ही हर्ष का विषय है कि स्कूल नहीं गए ऐसे लोग भी मोबाइल के कारण साक्षर हो गए। विशेषकर किशोर/किशोरियाँ/युवक/युवतियाँ/पुरुष/महिलाएँ, चाहे विवाहित हों या अविवाहित, देश की 40% प्रतिशत आबादी सोशल मीडिया के 24 घंटे के नशे में डूबी है। कोई समय नहीं। टॉयलेट से लेकर किचन, बेडरूम से लेकर कार्यस्थल तक, कार से लेकर स्कूटर-बाइक तक पर मोबाइल और ब्लूटूथ साथ। सबसे शुद्ध मोबाइल हैंडसेट है, कभी गंदा नहीं होता। इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप व अन्य ऐप पर आकर अपने आप पर फिल्टर लगाकर विश्व सुंदरियाँ समझने लगीं। पहले मेनकाएँ/अप्सराएँ नृत्यांगना बन स्टेज पर रिझाती थीं, अब मोबाइल पर। यहाँ यह भी देखने में आ रहा है कि हर आयु वर्ग की महिलाओं, युवतियों, किशोरियों की संख्या काफी ज्यादा है। सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर डालना, वह भी असंतुलित, अमर्यादित भाषा में और फॉलोअर्स बनाना एक तरह से अपने को पतन की ओर ले जाना, अपनी आईडेंटिटी देकर खतरा मोल लेना ही है।
मोबाइल परिवार का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है। नेटवर्क/चार्ज न मिलने से लगता है दुनिया में प्रलय आ गई। मोबाइल के नशे को थामने के लिए कोई निकटजन समझाता हो या मोबाइल का उपयोग लिमिट में करने की सलाह देता है तो उसे प्रेस्टीज इश्यू बनाकर लड़ाई-झगड़े और विवाद होते हैं। आत्महत्या कर लेने जैसे प्रकरण अखबारों में सुनने को मिलते हैं। आजकल एक शब्द काफी चल रहा है: लव जिहाद। इसके कारण काफी हिंसा और विवाद भी हैं। सोशल मीडिया इसमें आग में घी डालने का काम करता है। सबसे पहले लव और जिहाद शब्द को अलग-अलग करके देखने की आवश्यकता है।
लव का मतलब तो सबको पता है, प्यार। यह सामान्य, सरल शब्द है। यह माता-पिता, बच्चों, भाई-बहन, पति-पत्नी आदि के मध्य सम्मानजनक है। युवा अवस्था में दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों के बीच आकर्षण, काबिलियत, वैचारिक तालमेल के भी होता है। कई बार यह वैवाहिक रिश्तों में बदल जाता है, कई बार यह कथित प्यार की भावना, प्यार और साथी बदलती रहती है। इसका कारण और अधिक पाने की लालसा। इसमें किसी एक जेंडर को जिम्मेदार मानना गलत है कि लड़की गलत है या लड़का गलत। यह प्रचार-प्रसार पर निर्भर रहता है। इसने उसको फुसला लिया या उसने इसको। तीन से चार साल लिव-इन रिलेशन में रहने के बाद स्वार्थ पूरा होने पर या न पूरा होने पर जबरदस्ती संबंध बनाने का आरोप जायज नहीं। यदि पहली बार गलत हुआ तो उसी समय शिकायत या उचित कार्रवाई क्यों नहीं? महीनों, सालों बाद क्यों?
शायद इसका कारण मन भर जाना या स्वार्थ पूरा हो जाने के बाद अलग होने के लिए विवाद कर अपने को मासूम साबित करना, या अपेक्षाएँ और बढ़ती जाना। पति-पत्नी के बीच तलाक आम बात होती जा रही है तो लिव-इन रिलेशन में दूरी बन जाना अपराध नहीं। अखबारों में आरोप रहते हैं: फलाने ने मुझसे दोस्ती की, दोस्त फेसबुक, इंस्टाग्राम पर, और प्यार हो गया, शादी करने का भी निर्णय ले लिया। आज से कुछ माह या कुछ वर्ष पहले कथित दोस्त होटल/किसी रूम पर ले गया था, रिश्ता बनाया था। होटल या खाली फ्लैट में जाते समय नहीं सोचा कि क्यों और किस लिए जा रहे हैं? कोई बॉक्स या बैग में बंद करके तो ले नहीं जाता। जाने वाले तो साथ चलकर हँसते-मुस्कुराते ही जाते हैं, खुशी-खुशी बाहर आते हैं। आरोप रहता है: गर्भवती होने पर गर्भपात भी कराया। अरे भाई, गर्भपात क्यों करवाया? अजन्मे बच्चे को अपने शौक की खातिर क्यों मृत्युदंड दिया? इस तरह के गर्भपात के बाद महिला या युवती क्रूर स्वभाव की हो जाती है, क्योंकि अंदर की शर्म मर चुकी होती है। जो अपनी अजन्मी पहली संतान को मार सकती है, उसका स्वभाव बाद में हिंसक हो जाना कोई बड़ी बात नहीं।
ऐसी समस्याओं से निबटने के लिए अनकंडीशनल (बिना किसी शर्त के) विवाह करना चाहिए। नहीं निभे तो तलाक लेकर अनवांटेड रिश्ते की बदनामी से बचा जा सकता है। यदि विवाह सफल रहा तो प्यार सार्थक हो गया, आजीवन खुश। कुछ त्याग खुद करो तो कुछ त्याग जीवनसाथी का। सफल वैवाहिक जीवन के लिए जरूरी है: आपस में बैर और बहस नहीं। देह सुख क्षणिक है, जीवन सुख अजर-अमर। अब जिहाद शब्द के अर्थ को समझते हैं। “जिहाद” शब्द अरबी भाषा का है, जिसका मूल अर्थ है संघर्ष या प्रयास करना, यानी सही रास्ते पर चलने के लिए मेहनत करना। इस्लाम में जिहाद का मुख्य मतलब है: अपने अंदर की बुराइयों (गुस्सा, लालच, नफरत) से लड़ना, खुद को बेहतर इंसान बनाना।
जिहाद दो प्रकार समझे जाते हैं:
1. *बड़ा जिहाद*: खुद की गलत आदतों और बुरे विचारों से लड़ना। यह सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
2. *छोटा जिहाद*: अन्याय या अत्याचार के खिलाफ खड़ा होना, लेकिन यह केवल सख्त नियमों और नैतिक सीमाओं के भीतर ही माना जाता है।
क़ुरआन के अनुसार “जिहाद” का अर्थ केवल लड़ाई नहीं है, बल्कि अल्लाह के रास्ते में सही काम के लिए संघर्ष करना है, और इसमें सबसे बड़ा हिस्सा अच्छा इंसान बनने की कोशिश है। क़ुरआन में जिहाद का मतलब है: सच्चाई और न्याय के लिए कोशिश करना, बुराई से खुद को रोकना, अल्लाह के बताए रास्ते पर चलने की मेहनत। यानी यह आंतरिक और नैतिक संघर्ष भी है। जिहाद शब्द के साथ लव जोड़ना या लव के साथ जिहाद जोड़ना मेरी सोच में गलत है। आजकल सब समझदार हैं, धर्म और कर्म के मायने अपने स्वार्थ अनुसार बदल देते हैं।
वर्तमान में काफी महिलाएँ निरंकुश हैं, काफी चतुर-चालाक हो रही हैं। अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं पर नियंत्रण नहीं रख पातीं। पुरुषों से आगे निकलने की होड़ में दौड़ते-दौड़ते अपने को मेंटेन और सुंदर दिखने, फिगर मेंटेन करने के लिए पुरुषों से संबंध बनाने के लिए इच्छुक रहती हैं। इसके लिए पुरुषों को उकसाती भी हैं। इसका मुख्य कारण पारिवारिक/सामाजिक उपेक्षा, अपने आप को असुरक्षित समझना, ओवर कॉन्फिडेंस। लिख रहा हूँ, वह शोभनीय नहीं। समाज, व्यक्ति इसे स्वीकार नहीं करेंगे, पर सच तो यह है कि जिन रिश्तों को आपत्तिजनक रिलेशन बोलते हैं, वह जब तक पकड़ नहीं आते, तब तक वह जायज हैं। यदि कोई भूखा-प्यासा है, उसे खाना खिलाना, पानी पिलाना पुण्य का काम है। भूख-प्यास का सम्बन्ध भी ब्रेन से है, वही सिग्नल देता है कि भूख लगी है, प्यास लगी है।
हम पशु तक के लिए पानी और खाना रखते हैं, पुण्य की बात करते हैं। यदि कोई तेज धूप में या तेज हवा में जो स्कूटर, बाइक या पैदल जा रहा है या जा रही है, उसकी आँख जल रही है, ऐसी स्थिति देख कुछ संवेदनशील लोग अपना गॉगल स्थायी या टेम्परेरी रूप से दे देते हैं कि इसकी आँख को तकलीफ न हो। वस्त्र दान भी करते हैं, यह भी पुण्य का काम ही है। इसी क्रम में व्यक्तिगत और शरीर की और भी आवश्यकताएँ होती हैं जो किसी के सहयोग के बिना पूरी नहीं होतीं। पुरुषों की तरह महिलाओं को भी ब्रेन सिग्नल के द्वारा शारीरिक आवश्यकता की तलब लगती है। उसकी तलब पूरी नहीं होती तो वह चिड़चिड़ी और व्याकुल हो जाती है।
पुरुष अपने को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है, वह व्याकुल नहीं होता। पुरुष हमेशा त्यागता है: धन हो, सम्पत्ति हो या स्वयं हो। स्त्री इन सबको ग्रहण करती है। पुरुष के त्याग को कोई महत्व नहीं। वह दिन में 12 से 14 घंटे परिश्रम कर कमाता है, उसका दस प्रतिशत भी अपने पर खर्च नहीं करता। इस तरह की समस्याएँ विधवा, तलाकशुदा महिलाओं में मानसिक स्तर पर काफी होती हैं। विवाहित महिलाओं में भी पति की उपेक्षा, पारिवारिक सदस्यों से तालमेल न बैठने के कारण, या पति को पति के रूप में स्वीकार न करने पर दोनों के बीच दूरी, दैहिक तृष्णा बढ़ती है। यह ऐसी महिलाएँ होती हैं जो अपनी आयु को स्वीकार नहीं करतीं, अपनी इंद्रियों को नियंत्रित नहीं रख पातीं।
ध्यान रखें, यह सभी महिलाओं के लिए नहीं है। 90% सामान्य हैं। अनुमान अनुसार दस प्रतिशत महिलाओं के साथ यह समस्या गंभीर रूप से है। यह दैहिक सुख और आकर्षण का विषय है। जिस तरह किसी भूखे और प्यासे व्यक्ति को भोजन और पानी पिलाने से पुण्य मिलता है, यदि कोई धूप में या तेज हवा में जा रहा है, बाइक-स्कूटर या पैदल, उसकी आँखें जल रही हैं, आँख की सुरक्षा के लिए उसके पास उस समय गॉगल नहीं है, तो यह देख कुछ लोग संवेदनशील होकर उसे अपना गॉगल स्थायी या टेम्परेरी तौर पर दे देते हैं कि उसकी आँख सुरक्षित रहे, यह मदद भी पुण्य ही है।
उसी तरह से इन्हें शारीरिक संतुष्टि देने के लिए औपचारिक तौर पर गले लगाना, स्पर्श देना भी इन्हें संतोष देता है। यहाँ यह ध्यान रखना है: गले लगाना है, गले नहीं पड़ने देना है। ऐसे में व्यक्ति स्वयं बिखर जाएगा। इससे इनके भटकते जीवन को एक जगह रोक लेना आवश्यक है, यह भी एक पुण्य का काम है।
इस तरह महिलाओं को भी ध्यान रखना चाहिए: आँख को सुरक्षित रखने के लिए गॉगल पर गॉगल नहीं लगाए जाते। आँख एक ही गॉगल से सुरक्षित रहती है। एक के ऊपर एक, फिर एक के ऊपर एक लगा लेने से नुकसान ही होगा। जिसे और जिसका गॉगल चुना है, वह एक ही काफी है।
इसे लव या प्यार का नाम न दिया जाए, न ही धन या लालच। धन और लालच देने से इस तरह का सुख खरीदना और बेचना होगा। यह एक आपसी समझौते के रूप में हो: कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं, कोई अपेक्षा और उपेक्षा नहीं। सार्वजनिक नहीं तो गुप्त भी नहीं, कुछ लोगों की जानकारी में होना आवश्यक है।
जीवन है, सही-गलत के सिद्धांत इंसान ने बनाए हैं। यहाँ यह भी समझना आवश्यक है: अंग दान करना या अंग दान में लेना एक या दो से ही ठीक है। पूरे शहर से तो अंगदान में लेने की सोचना ही गलत है।
पहले इंसान की मृत्यु के उपरांत उसके शरीर का मृत्यु संस्कार किया जाता था। यह भी ध्यान रखा जाता था कि उसका मृत शरीर खंडित न हो। उसे सम्मानजनक रूप से दफनाया जाता या चिता पर रख दाह संस्कार किया जाता। धर्मशास्त्रों के अनुसार तभी उसे मोक्ष मिलता और उसकी आत्मा को शांति। पहले आकस्मिक, संदेहास्पद मृत्यु पर भी परम्पराओं अनुसार पोस्टमार्टम तक का अज्ञानता के कारण विरोध भी होता था।
समय बदल गया। अब ब्रेनडेड व्यक्ति की किडनी, लिवर, हार्ट, लंग्स, आँख, स्किन और भी अंग मृत व्यक्ति के परिजन दान कर देते हैं। यहाँ यह भी सोचने की बात है: मृत व्यक्ति के शरीर के अंगों पर उसका अधिकार था, दूसरे उसे कैसे दान कर सकते हैं? समय अनुसार सिद्धांत बदला। एक मृत व्यक्ति के जीवन के बदले कई को जीवन दान मिला।
इसी तरह किसी को जीवन में सुख देना आवश्यक है। उस समय चमड़ी से चमड़ी मिलाना भी किसी का जीवन बचाना, जीने के लिए उद्देश्य देना भी पुण्य है, मृत-सी काया को सांस देने के समान है।
उक्त विचार लेखक के अपने है।
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